हाई शुगर डाइट से आंत को सुरक्षा देने वाली मूकस लेयर क्षतिग्रस्त हो सकती है और इससे कोलाइटिस बीमारी और ज्यादा बढ़ सकती है, जो कि पाचन तंत्र से जुड़ी एक इन्फ्लेमेटरी बाउल डिसीज (आईबीडी) है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन के तहत चूहों को हाई शुगर वाली डाइट खिलाई थी, जिससे उनमें ये प्रभाव दिखाई दिए हैं। अध्ययन से जुड़े एक शोधकर्ता हसन जाकी ने बताया है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में कोलाइटिस एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है इस लिहाज से यह अध्ययन काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हाई फैट युक्त डाइट से आईबीडी का खतरा होता है और शुगर युक्त आहार लेने से यह खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने शुगर को आईबीडी का प्रमुख कारण मानते हुए अलग-अलग प्रकार की डाइट की जांच की है। इनमें हाई फ्रक्टोस कॉर्न सिरम विशेष रूप से शामिल है, जिसे अमेरिकी फूड इंडस्ट्री 1960 के दशक से बना रही है। बताया जाता है कि इसमें ग्लूकोज काफी ज्यादा मात्रा में होता है। अन्य प्रकार की मीठी सॉफ्ट ड्रिंक्स और खाद्य पदार्थ बनाने में इस कॉर्न सिरम का खासा इस्तेमाल होता है, जिन्हें बड़ी संख्या में लोग खाते-पीते हैं। अध्ययन की मानें तो जैसे-जैसे फूड इंडस्ट्री में इस सिरम शुगर का इस्तेमाल बढ़ा है, वैसे-वैसे पश्चिमी देशों में आईबीडी के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।

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अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास (यूटी) साउथवेस्टर्न के शोधकर्ताओं ने चूहों को सात दिनों तक पानी का एक घोल पिलाया, जिसमें कई प्रकार के डायटरी शुगर (जैसे ग्लूकोज, फ्रक्टोस, सूक्रोस आदि) मिलाए गए थे। इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि जो चूहे आनुवंशिक रूप से कोलाइटिस के खतरे में थे या जिन्हें ऐसा केमिकल दिया गया था जिससे कोलाइटिस हो, उनमें सबसे पहले शुगर दिए जाने पर इस बीमारी के गंभीर लक्षण देखने को मिले थे। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन चूहों की बड़ी आंत में पाए जाने वाले बैक्टीरिया के प्रकार और उसकी मात्रा जानने के लिए जीन-सीक्वेंसिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया। शुगर युक्त घोल दिए जाने से पहले और बाद में दोनों स्थिति में इन तकनीकों की मदद ली गई। शोधकर्ताओं को पता चला कि शुगर (सूक्रोस, फ्रक्टोस और विशेषकर ग्लूकोस) युक्त आहार देने से चूहों की आंत के अंदर माइक्रोबायल पॉप्युलेशन में उल्लेखनीय बदलाव आ गए थे। 

आंत का बैक्टीरिया उसमें कफ को कम करने वाले एंजाइम पैदा करने के लिए जाना जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, शुगर युक्त घोल पिलाए जाने से चूहों की आंतों में इन एंजाइम्स की संख्या काफी ज्यादा बढ़ गई थी। वहीं, गुड बैक्टीरिया माने जाने वाले अन्य प्रकार के कीटों या बग की संख्या कम हो गई थी। जांच में वैज्ञानिकों ने देखा कि हाई शुगर के प्रभाव के चलते चूहों की मूकस लेयर पतली हो रही थी, जो बड़ी आंत की परत को प्रोटेक्ट करने का काम करती है। साथ ही अन्य प्रकार के बैक्टीरिया से संक्रमण होने के सबूत भी मिले थे।

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इस जानकारी को लेकर अध्ययन में कहा गया है, 'चूहों में मूकस लेयर के कटाव के कारण गट बैक्टीरिया की बड़ी आंत की एपीथीलियल लेयर से नजदीकी बढ़ गई थी। एपीथीलियल लेयर में घुसपैठ का मतलब है इन्टेस्टाइनल इन्फ्लेमेशन की शुरुआत होना।' अध्ययन में इस समस्या के लिए ग्लूकोज को प्रमुख रूप से जिम्मेदार शुगर बताया गया है। हालांकि गट माइक्रोबायोटा की कंपोजीशन को बिगाड़ने में तीनों ही शुगर की भूमिका प्रमुख रूप से पाई गई है। यह तथ्य इस मायने में महत्वपूर्ण है कि चूहों की तरह इन्सानों का गट माइक्रोबायोटा भी डाइट चेंज होते ही तेजी से बदलने लगता है। इस पर डॉ. हसन जाकी का कहना है, 'हमारे अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आपको अपने खाने पर ध्यान देना होगा।'

शुगर खाने वाले चूहों के गट माइक्रोबायोटा में ये बदलाव देखने के बाद शोधकर्ताओं ने इन चूहों का मल अन्य चूहों को खिलाया। इससे उन चूहों में कोलाइटिस और ज्यादा गंभीर रूप से विकसित हुआ। इससे पता चला कि कोलाइटिस से पीड़ित जानवरों के जरिये ग्लूकोस से कोलाइटिस होने का खतरा घातक इन्टेस्टाइनल माइक्रोबायोटा के साथ ट्रांसमिट भी हो सकता है। अब डॉ. हसन जाकी और उनकी टीम यह जानने के लिए एक और अध्ययन करने की योजना बना रही है कि क्या हाई शुगर लेने से अन्य प्रकार की इन्फ्लेमेटरी बीमारियां, जैसे मोटापा, फैटी लिवर और न्यूरोडीजेनरेटिव डिसीज (जैसे अल्जाइमर) भी हो सकती हैं। अगर हां, तो कैसे।

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