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पाइलोनाइडल सिस्‍ट सर्जरी एक छोटी सर्जरी है जिसमें पाइलोनाइडल सिस्‍ट को निकाला जाता है। सिस्‍ट को काटने के बाद भी इसके दोबारा होने के मामले बहुत आते हैं।

पाइलोनाइडल सिस्‍ट बालों के फॉलिकल के आसपास बनने वाली एक थैली होती है। आमतौर पर यह व्‍यक्‍ति की टेलबोन के पास कूल्‍हों के चीक्‍स के बीच होती है। महिलाओं की तुलना में यह ज्‍यादा बालों वाले युवा पुरुषों को होती है।

सिस्‍ट बनने के बाद यह इंफेक्‍शन कर सकती है और बाद में साइनस भी हो सकता है जिससे पस निकले। इसलिए इस स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या का समय पर इलाज करना बहुत जरूरी होता है।

पाइलोनाइडल सिस्‍ट की सर्जरी छोटी होती है और मरीज को सर्जरी के लिए सुबह भर्ती कर के शाम को छुट्टी दे दी जाती है।

ऑपरेशन के बाद घाव की देखभाल करना अहम होता है क्‍योंकि अगर इसे ठीक से न रखा जाए तो इसमें इंफेक्‍शन हो सकता है। घाव 3 हफ्ते से 3 महीने में ठीक हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी सर्जरी किस तरह से की गई है।

  1. पाइलोनाइडल सिस्‍ट सर्जरी क्‍या है
  2. कब की जाती है सर्जरी
  3. सर्जरी कब नहीं करनी चाहिए
  4. सर्जरी से पहले की तैयारी - Pilonidal cyst surgery se pehle ki taiyari
  5. सर्जरी कैसे की जाती है - Pilonidal cyst surgery karne ka tarika
  6. सर्जरी के जोखिम और परिणाम - Pilonidal cyst surgery se jude risk
  7. अस्‍पताल से छुट्टी और फॉलो-अप - Pilonidal cyst surgery ke baad discharge aur follow-up
  8. सारांश - Takeaway
पाइलोनाइडल सिस्ट सर्जरी के डॉक्टर

पाइलोनाइडल सिस्‍ट एक थैली की तरह होती है जो बालों के फॉलिकल के आसपास बनती है और इसमें बाल और स्किन के डेब्रिस होते हैं। यह कूल्‍हों के चीक्‍स के बीच में बनती है। यह सिस्‍ट बहुत जल्‍दी बढ़कर पस वाली सूजन जैसे फोड़े का रूप ले लेती है और आगे चलकर इसका साइनस बन जाता है जिससे पस और खून निकलता है।

पाइलोनाइडल सिस्‍ट सर्जरी एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें पूरी सिस्‍ट को निकाला जाता है। यह प्रमुख रूप से दो तरीकों से की जाती है :

  • सिस्‍ट का इंसीजन और ड्रेनेज : अगर पहली बार सिस्‍ट बनी है और इंफेक्‍शन कम है, तो यह तरीका अपनाया जाता है।
  • पाइलोनाइडल सिस्‍टेक्‍टोमी : यदि सिस्‍ट बार-बार हो रही है या लंबे समय से है या इंफेक्‍शन बढ़कर फोड़े या साइनस का रूप ले रहा होता है, तो इसे तरीके से सर्जरी की जाती है।

सिस्‍ट के लक्षणों के आधार पर तय किया जाता है कि सर्जरी करनी है या नहीं। इसके लक्षण हैं :

  • टेलबोन के आसपास लालिमा और सूजन होना और इसे छूने पर दर्द महसूस होता है। बैठने पर दर्द का बढ़ जाना।
  • फोड़ा बनना : सूजन में इंफेक्‍शन और पस होना। इससे संबंधित लक्षणों में बहुत तेज दर्द, बुखार और बेचैनी शामिल है।
  • डिस्‍चार्ज वाला साइनस : फोड़े का फूटना और सिस्‍ट का स्किन के बाहर पस के रूप में निकलना।

इस सर्जरी को लेकर कोई मतभेद नहीं है। हालांकि, पहले से हो रखी किसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या जैसे कि डायबिटीज का कंट्रोल में होना चाहिए क्‍योंकि शुगर कंट्रोल न होने पर सर्जरी के बाद घाव भरने की संभावना कम और दोबारा इंफेक्‍शन होने का खतरा बढ़ जाता है।

पहले जनरल सर्जन मरीज की मेडिकल हिस्‍ट्री पूछते हैं। सिस्‍ट की गंभीरता के आधार पर सर्जन चुनते हैं कि किस तरह की सर्जरी होनी है।

ऑपरेशन से पहले रूटीन ब्‍लड टेस्‍ट होते हैं और कोई विशेष पूछताछ की जरूरत नहीं होती है। 

यदि मरीज पहले से हुई किसी बीमारी की दवा ले रहा है, तो डॉक्‍टर इन्‍हें लेने से मना कर सकते हैं।

सर्जरी के बाद घर ले जाने के लिए परिवार से कोई सदस्‍या या दोस्‍त होना चाहिए क्‍योंकि अभी भी मरीज एनेस्‍थीसिया के असर में हो सकता है या उसे सर्जरी वाली जगह पर दर्द हो सकता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर दिन में ही की जाती है।

इस सर्जरी को दो तरह से किया जाता है, जैसे कि :

  • इंसीजन और ड्रेनेज

    यदि इंफेक्‍शन कम है और सिस्‍ट पहली बार हुई है तो इस तरीके से सर्जरी की जाती है। मरीज को इस प्रक्रिया के लिए प्रोसीजर रूम में ले जाया जाता है और प्रक्रिया के दौरान पेट के बल लिटाया जाता है।
    प्रभावित हिससे को साफ कर के उसे साफ ड्रेप से ढक दिया जाता है। इस हिस्‍से को सुन्‍न करने के लिए लोकल एनेस्‍थीसिया दिया जाता है।
    सिस्‍ट के अंदर स्‍कालपेल (धारदार चाकू) से कट लगाया जाता है और पस को निकाला जाता है। पस निकालने से सिस्‍ट का प्रेशर रिलीज होता है और इस तरह दर्द और सूजन में कमी आती है।
    घाव को साफ कर के इस पर पट्टी कर दी जाती है। आसपास के बालों के फॉलिकलों को भी निकाल दिया जाता है ताकि इसके दोबारा होने का खतरा न रहे।
    फायदे : यह प्रक्रिया लोकल एनेस्‍थीसिया देने के बाद की जाती है और इसमें सिस्‍टेक्‍टोमी के मुकाबले जल्‍दी रिकवरी हो जाती है।
    नुकसान : हो सकता है कि सिस्‍ट से इंफेक्‍शन पूरी तरह से न जाए इसलिए इसमें दोबारा सिस्‍ट बनना कॉमन बात है।
     
  • पाइलोनाइडल सिस्‍टेक्‍टोमी

ज्‍यादा गंभीर मामलाों में यह तरीका अपनाया जाता है जहां इफेक्‍शन फैल रहा हो या साइनस डिस्‍चार्ज हो रहा हो। ऑपरेशन थिएटर में यह सर्जरी की जाती है। मरीज को सर्जरी से एक रात पहले कुछ भी खाने-पीने के लिए मना किया जाता है।

अस्‍पताल पहुंचने के बाद मरीज को हॉस्‍पीटल गाउन पहनाई जाती है और फिर उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाता है। मरीज को ऑपरेशन टेबल पर पेट के बल लिटाया जाता है और उसकी हार्ट रेट, बीपी आदि चैक करने के लिए मॉनिटर को बॉडी से अटैच किया जाता है। आईवी कैनुला से जनरल एनेस्‍थीसिया दिया जाता है। इसके अलावा शरीर के सिर्फ निचले हिस्‍से को सुन्‍न करने के लिए सिर्फ रीजनल एनेस्‍थीसिया भी दिया जा सकता है।

सर्जरी वाली जगह को साफ कर के उसे ड्रेप से ढक दिया जाता है। इंफेक्‍शन कितना फैला है और साइनस कितना गहरा और ज्‍यादा है, इसी के आधार पर प्रभावित जगह से ऊतकों को निकाला जाता है और फिर घाव को ठीक से साफ कर दिया जाता है।

यदि कट के बाद घाव छोटा हो, तो इसे खुला छोड़कर मेडिकल पट्टी से ढक दिया जाता है। लेकिन अगर घाव बड़ा है तो इसे टांकों से बंद किया जाता है। कुछ मामलों में जब ज्‍यादा साइनस होते हैं, शरीर के किसी और हिस्‍से से ऊतक लेकर कट को ढक कर घाव को सिया जा सकता है। इस पूरी सर्जरी में लगभग 45 मिनट से एक घंटे का समय लगता है।

फायदे : इस प्रक्रिया से सिस्‍ट और साइनस ज्‍यादा निकलता है। इस तरह सिस्‍ट के दोबारा बनने का खतरा कम रहता है।

नुकसान : चूंकि, इसमें घाव बड़ा होता है इसलिए रिकवर करने में समय लग जाता है। एनेस्‍थीसिया की वजह से कोई प्रॉब्‍लम हो सकती है।

इस सर्जरी से कुछ कम जोखिम जुड़े हैं। हालांकि, इसकी वजह से आने वाली जटिलताएं आम हैं, जैसे कि :

  • दोबारा सिस्‍ट बनना : सर्जरी के सफल होने के बाद भी सिस्‍ट के दोबारा बनने का खतरा रहता है। यह सबसे आम जटिलता है।
  • बुखार
  • घाव वाली जगह से बहुत ज्‍यादा ब्‍लीडिंग या पस निकलना।
  • घाव वाली जगह पर लालिमा, सूजन या दर्द बढ़ना।
  • कुछ दुर्लभ मामलों में लंबे समय तक इंफेक्‍शन रहने की वजह से घाव नहीं भरता है और ये स्किन कैंसर बन सकता है।

सर्जरी के बाद कुछ घंटों के लिए मरीज को मॉनिटर किया जाता है और इस दौरान डॉक्‍टर बताते हैं कि घर पर घाव की देखभाल किस तरह करनी है। डिस्‍चार्ज से पहले दवा लिखी जाती हैं और घाव की देखभाल को लेकर सलाह दी जाती है, जैसे कि :

  • बताया जाता है कि पहले हुई किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं, तो उसे जारी रखना है या बंद करना है।
  • इंफेक्‍शन और दर्द से बचने के लिए एंटीबायोटिक और दर्द निवारक दवाएं
  • ज्‍यादा देर तक खासतौर पर सख्‍त जगह पर बैठने से मना किया जाता है। अगर देर तक बैठने की जरूरत हो तो मरीज को कुशन पर बैठने की सलाह दी जाती  है।
  • मोटे लोगों को वजन घटाने की सलाह दी जाती है कि क्‍योंकि सिस्‍ट बनने का एक कारण मोटापा भी होता है।
  • घाव की नियमित पट्टी की जानी चाहिए ताकि जल्‍दी घाव भरे और इंफेक्‍शन न हो।
  • नहाने के बाद घाव को अच्‍छी तरह से सुखा लें।
  • निजी साफ-सफाई पर भी ध्‍यान दें। कूल्‍हों के आसपास के बालों को ट्रिम या शेव करें और सूती अंडरगार्मेंट पहनें। इससे इंफेक्‍शन नहीं होता है।
  • सर्जरी वाली जगह से ब्‍लीडिंग, पस निकलने, छूने पर बहुत दर्द या सूजन होने पर मरीज को तुरंत डॉक्‍टर को बताना चाहिए।

आमतौर पर सर्जरी के बाद घार 3 हफ्तों से 3 महीनों में भर जाता है। अगर कोई टांका लगा है, तो उसे तीसरे या चौथे हफ्ते में निकाला जाता है। डॉक्‍टर बताएंगे कि फॉलो-अप के लिए कब आना है।

पाइलोनाइडल सिस्‍ट सर्जरी, नॉन-सर्जरी वाले तरीकों की तुलना में ज्‍यादा सही है। इसके जोखिम बहुत कम हैं और सर्जरी में भी कम समय लगता है। सिस्‍टेक्‍टोमी के सफल होने की दर इंसीजन और ड्रेनेज से ज्‍यादा है। इंफेक्‍शन से बचने के लिए घाव की देखभाल जरूरी है। इस प्रक्रिया के सफल होने की दर ज्‍यादा होने के बावजूद सिस्‍ट दोबारा बन जाती है।

Dr. Surendra Kumar

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