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कार्पल टनल सर्जरी एक छोटी सर्जरी होती है जो कि कार्पल टनल सिंड्रोम के इलाज और इसे मैनेज करने के लिए की जाती है। कार्पल टनल सिंड्रोम कलाई को प्रभावित करने वाली एक दर्दनाक स्थिति है। इस सर्जरी से पहले ब्‍लड टेस्‍ट, रेडियोलॉजिकल टेस्‍ट और नसों एवं मांसपेशियों की स्‍टडी की जाती है। इस सर्जरी में कम समय लगता है और इससे होने वाली जटिलताएं भी कम हैं और सर्जरी के परिणाम अच्‍छे हैं। ऑपरेशन के बाद मरीज की देखभाल में कलाई को गतिशील बनाना और फिजियोथेरेपी लेना शामिल है।

  1. कार्पल टनल सर्जरी क्‍या है - Carpal tunnel surgery kya hai
  2. कार्पल टनल सर्जरी कब करवानी पड़ती है - Carpal tunnel surgery kab karvani chahiye
  3. कार्पल टनल सर्जरी किसे नहीं करवानी चाहिए - Carpal tunnel surgery kaun nahi karva sakta hai
  4. कार्पल टनल सर्जरी से पहले की तैयारी - Carpal tunnel surgery se pehle ki taiyari
  5. कार्पल टनल सर्जरी कैसे की जाती है - Carpal tunnel surgery karne ka tarika
  6. सर्जरी से जुड़े जोखिम और जटिलताएं - Carpal tunnel surgery ki complications
  7. कार्पल टनल सर्जरी के बाद देखभाल कैसे करें - Carpal tunnel surgery ke baad care kaise kare
  8. सारांश - Takeaway

कलाई के अंदर एक छोटी-सी संकरी नलिका को कार्पल टनल कहते हैं। यह कलाई की हड्डियों (कार्पल हड्डियों) और लिगामेंटों (हड्डी को हड्डी से जोड़ने वाले संयोजी ऊतक) से घिरी होती है। टनल में नस होती है जिसे मीडियन नर्व कहते हैं। ये नस हाथ की कुछ मांसपेशियों की आपूर्ति करती है। इसमें टेंडन भी होते हैं, ये संयोजी ऊतक हैं जो मांसपेशी को हड्डी से जोड़ते हैं। जब आसपास के टेंडन पर दबाव पड़ने या सूजन की वजह से मीडियन नस पर दबाव पड़ता है, तो इससे कलाई में दर्दभरे लक्षण पैदा होने लगते हैं। इस स्थिति को कार्पल टनल सिंड्रोम कहते हैं। नलिका (कैनाल) पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए की जाने वाली सर्जरी को कार्पल टनल सर्जरी कहते हैं। यह एक छोटी-सी प्रक्रिया है जिसकी सफलता की दर काफी ऊंची है। यह निम्‍न में से किसी एक तरीके से की जा सकती है :

  • ओपल कार्पल टनल रिलीज
  • एंडोस्‍कोपिक कार्पल टनल रिलीज

कार्पल टनल सिंड्रोम का पता चलने और इलाज के अन्‍य तरीकों (बिना सर्जरी वाले) के फेल होने पर इस सर्जरी की सलाह दी जाती है। कार्पल टनल सिंड्रोम के लक्षण हैं :

  • ऊंंगलियों में खासतौर पर अंगूठे और तर्जनी ऊंगली में झनझनाहट और दर्द होना।
  • ऊंगलियों में सनसनाहट कम होना।
  • ऊंगलियों में कुछ भी महसूस न होना या उनका पूरी तरह से सुन्‍न होना।
  • आसान काम करने में भी दिक्‍कत होना, जैसे कि :
    • स्टीयरिंग व्हील को घुमाना
    • छोटी चीजों को संभालना
    • की-बोर्ड इस्‍तेमाल करना
    • देर तक लिखना
  • इसके बाद के लक्षणों में हाथ में कमजोरी, बारीक काम करने (जैसे कि कपड़ों के बटन लगाने या खोलने) या बार-बार हाथ से चीजें गिरना शामिल है।

शुरुआत में लक्षण सिर्फ कलाई से काम करने पर ही दिखते हैं लेकिन जैसे-जैसे यह समस्‍या बढ़ती है, लक्षण लगातार बने रहने लगते हैं और गंभीर रूप ले लेते हैं।

कार्पल टनल सिंड्रोम से ग्रस्‍त कोई भी व्‍यक्‍ति डॉक्‍टर की सलाह पर इस सर्जरी को करवा सकता है। हालांकि, सर्जरी से पहले कुछ चीजों पर ध्‍यान देना जरूरी है :

  • अगर बिना सर्जरी वाले तरीकों और जीवनशैली में बदलाव कर के दर्द कम हो रहा है, तो सर्जरी को टाला जा सकता है।
  • कोई अन्‍य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या या स्थिति कार्पल टनल सिंड्रोम जैसी लग सकती है इसलिए पहले उसका पता लगाने की कोशिश करें और कार्पल टनल सिंड्रोम की पुष्टि करें।
  • यदि मरीज को पहले से कोई बीमारी (जैसे कि डा‍यबिटीज, हार्ट की बीमारी आदि) है जो सर्जरी से पहले उसे कंंट्रोल करना जरूरी है। इससे एनेस्‍थीसिया से और ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है।

जनरल सर्जन या ऑर्थोपेडिक सर्जन (हड्डियों के डाॅक्‍टर) यह सर्जरी करते हैं। मरीज से उसके स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में पूरी जानकारी ली जाती है जैसे कि लक्षणों के बारे में, फैमिली हिस्‍ट्री (जन्‍म से ही हड्डी के खिसकने से यह स्थिति हुई हो) और कौन-सी दवाएं लेते हैं। कलाई की जांच कर के पता किया जाता है कि बीमारी कितना गंभीर रूप ले चुकी है।

अगर पहले से ही किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं, तो सर्जन सर्जरी से पहले उसमें बदलाव या उसे बंद कर सकते हैं।

सर्जरी से पहले निम्‍न जांचें की जाती हैं :

  • रूटीन ब्‍लड टेस्‍ट
  • थायराइड फंक्‍शन टेस्‍ट (टीएफटी) : देखा गया है कि हाइपोथायराइडिज्‍म कार्पल टनल सिंड्रोम कर सकता है
  • छाती का एक्‍स-रे
  • कलाई में चोट तो नहीं लगी है या आर्थराइटिस के लक्षणों का पता लगाने के लिए एक्‍स-रे
  • ईसीजी
  • इलेक्ट्रोमायोग्राफी (ईएमजी) : प्रभावित नस को खून की आपूर्ति करने वाली नसों और मांसपेशियों की स्थिति को जानने के लिए यह जांच की जाती है। कार्पल टनल सिंड्रोम में मीडियन नर्व दब जाती है जिससे अंगूठे और तर्जनी अंगुली की मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है
  • टनल कितना संकरा हो चुका है, यह जानने के लिए कलाई की एमआरआई किया जा सकता है

इस सर्जरी के लिए मरीज को दिन में भर्ती (सुबह भर्ती होकर शाम को छुट्टी मिल जाती है) होना होता है। सर्जरी के बाद घर ले जाने के लिए मरीज के साथ कोई दोस्‍त या रिश्‍तेदार होना चाहिए। सर्जरी से एक रात पहले कुछ भी खाने-पीने से मना किया जाता है। सर्जरी वाल दिन मरीज को सभी जरूरी रिपोर्टों और कागजों के साथ अस्‍पताल आना होता है। अस्‍पताल में भर्ती होने के बाद मरीज को हॉस्‍पीटल गाउन पहनाई जाती है और सर्जन स्‍वास्‍थ्‍य की पूरी जांच करते हैं। नर्स सर्जरी वाली जगह को साफ करती है। सर्जरी का तरीका और इससे जुड़ी जटिलताएं एवं जोखिमों के बारे में बताने के बाद मरीज की अनुमति के लिए एक फॉर्म साइन करवाया जाता है। सर्जरी वाली जगह से बाल हटाए जाते हैं और जिस कलाई पर ऑपरेशन किया जाना है, उस पर निशान लगा दिया जाता है। इसके बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाता है।

सर्जरी के लिए मरीज को ऑपरेशन टेबल पर पीठ के बल लिटाया जाता है। मरीज की हार्ट रेट, बीपी और ऑक्‍सीजन सैचुरेशन आदि चेक करने के लिए मॉनिटर को बॉडी से जोड़ा जाता है। अब बांह की नस में आईवी ड्रिप लगाकर सर्जरी के लिए जरूरी दवाएं दी जाती हैं। अब जिस कलाई का ऑपरेशन होना है, उसे साफ कर के सर्जिकल ड्रेप से ढक दिया जाता है। मरीज को रीजनल एनेस्‍थीसिया (जिसमें प्रभावित हिस्‍से को सुन्‍न कर दिया जाता है) देकर यह सर्जरी की जाती है। इस एनेस्‍थीसिया को रीजनल ब्‍लॉक भी कहते है। कुछ दुर्लभ मामलों में जनरल एनेस्‍थीसिया भी देना पड़ सकता है।

यह सर्जरी दो तरीके से की जा सकती है, जैसे कि :

  1. टनल का ओपन रिलीज : इसमें सर्जन लगभग दो इंच लंबा कट लगाते हैं और फिर कुछ उपकरणों की मदद स टनल लिगामेटों को काट देते हैं। इससे टनल में जगह बढ़ जाती है और मीडियन नर्व पर पड़ रहा प्रेशर कम होता है।
  2. टनल का एंडोस्‍कोपिक रिलीज : इस तरीके में सर्जन दो कट लगाते हैं, एक हथेली पर और दूसरा कलाई पर। ये कट आधे इंच के होते हैं। एक कट से छोटा-सा कैमरा डाला जाता है जिससे सर्जन कलाई के अंदर की संरचना को देख पाते हैं और दूसरे कट से विशेष उपकरण डालकर लिगामेंट को काटा जाता है जिससे टनल में चौड़ी जगह बन जाती है। इस तरीके का यह फायदा होता है कि इसमें कट छाट लगते हैं और ऑपरेशन के बाद दर्द कम होता है। हालांकि, यह ओपन सर्जरी की तुलना में महंगा होता है।

लिगामेंट को रिलीज करने के बाद घुलने वाले टांकों से कट को बंद कर दिया जाता है। कलाई का जोड़ हिले नहीं, इसके लिए हाथ और कलाई स्प्लिंट और मोटी पट्टी कर दी जाती है। इस बात का ध्‍यान रखा जाता है कि पट्टी ज्‍यादा टाइट न हो और मरीज अपनी उंगलियो के छोरों को हिला पाए। इस सर्जरी में लगभग 10 से 30 मिनट का समय लगता है।

इस सर्जरी से बहुत कम ही कोई जटिलता या मुश्किल आती है। हालांकि, इसके कुछ जोखिम जरूर हैं, जैसे कि :

  • लिगामेंट का पूरी तरह से रिलीज न होना
  • बहुत ज्‍यादा ब्‍लीडिंग होना
  • मीडियन नर्व को चोट लगना
  • मांसपेशियों के टेंडनों को चोट लगना
  • घाव में इंंफेक्‍शन होना
  • अत्‍यधिक स्‍कार लगना
  • एनेस्‍थीसिया की वजह से कोई दिक्‍कत होना

सर्जरी के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकालकर कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है और कुछ घंटों के लिए ऑब्‍जर्वेशन में रखा जाता है। सर्जरी वाली जगह पर दर्द को कम करने के लिए दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं। हाथ में सनसनी महसूस होने का मतलब है एनेस्‍थीसिया का असर कम हो रहा है। डॉक्‍टर मरीज के डिस्‍चार्ज के पेपर बनाते हैं जिसमें जरूरी दवाओं और घाव की देखभाल करने के बारे में जानकारी होती है। इसमें निम्‍न बातें बताई जाती हैं :

  • यदि पहले से हुई किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं, तो उसे जारी रखना है या नहीं।
  • इंफेक्‍शन और दर्द से बचने के लिए एंटीबायोटिक और दर्द निवारक दवाएं लिखी जाती हैं।
  • सर्जरी के बाद 12 से 24 घंटों तक सूजन और दर्द रहेगा और इसके बाद धीरे-धीरे कम होता चला जाएगा।
  • जब तक पट्टी नहीं खुल जाती, तब तक हाथ से कोई भारी या मुश्किल काम न करें।
  • नहाते समय ध्‍यान रखें कि पट्टी पर पानी न जाए।
  • कलाई के जोड़ में अकड़न को कम करने के लिए उंगलियों के छोरों को हिलाने की सलाह दी जा सकती है।
  • जल्‍दी रिकवर करने और दोबारा लक्षण आने से बचने के लिए लाइफस्‍टाइल में कुछ बदलाव करने की सलाह दी जा सकती है।

सर्जरी के बाद मरीज को लक्षणों में राहत महसूस होगी। निम्‍न लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्‍टर को बताएं :

  • बहुत ज्‍यादा दर्द या सूजन
  • बांंह में कुछ महसूस न होना या झुनझुनी ज्‍यादा महसूस होना
  • अत्‍यधिक ब्‍लीडिंग होना
  • बुखार

सर्जरी के 1 से 2 हफ्ते के बाद पहले फॉलो-अप पर पट्टी निकाल दी जाती है। कलाई के जोड़ में थोड़ी अकड़न महसूस हो सकती है। टांके खोलकर घाव को चेक किया जाएगा।

कलाई की गतिशीलता को बढ़ाने के लिए डॉक्‍टर कुछ एक्‍सरसाइज बताएंगे। इससे जल्‍दी ठीक होने में भी मदद मिलेगी। कुछ मामलों में हाथ को पहले की तरह एक्टिव करने के लिए सीरियल फिजियोथेरेपी सेशन (ऑक्‍यूपेशनल फिजियोथेरेपी) की सलाह दी जाती है। पट्टी खुलने के बाद आप हाथ से हल्‍के-फुल्‍के काम कर सकते हैं। हाथ को पूरी तरह से ठीक होने में लगभग 2 महीने का समय लगता है। कुछ दुर्लभ मामलों में ठीक होने में एक साल तक का समय भी लग सकता है।

जब कार्पल टनल सिंड्रोम की वजह से रोजमर्रा के काम करने में अधिक कठिनाई आने लगती है, नॉन-सर्जिकल (जैसे दवा) तरीके असफल हो जाते हैं, तब कार्पल टनल सर्जरी की जाती है। इस सर्जरी में कम समय लगता है और इसके सफल होने की दर ज्‍यादा है और इसमें कम ही जटिलताएं देखी जाती हैं और इसके बाद बीमारी के दोबारा होने की दर भी कम है। सर्जरी की एंडोस्‍कोपिक तकनीक ज्‍यादा फायदेमंद है क्‍योंकि इससे स्‍कार कम पड़ता है और ओपन तकनीक की तुलना में सर्जरी के बाद दर्द भी कम होता है। सर्जरी के बाद देखभाल में ऑक्‍यूपेशनल थेरेपी की मदद से कलाई और हाथ को ठीक किया जा सकता है।

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