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सिद्ध पद्धति, चिकित्सा का प्राचीन अभ्यास है और ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में तीसरी से 10वीं शताब्दी ईसा पूर्व हुई थी। ऐसा माना जाता है कि सिद्ध चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद से भी ज्यादा पुरानी है। हालांकि, बीमारियों के इलाज में जड़ी बूटियों का इस्तेमाल जैसे कुछ नियम और सिद्धांत आयुर्वेद और सिद्ध दोनों में एक समान हैं। 

हिंदू धर्म में चिकित्सा और आरोग्य के भगवान माने जाने वाले धन्वंतरी को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। वहीं, ऋषि अगस्त्य को सिद्ध चिकित्सा के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। तमिल भाषा में सिद्ध का अर्थ है ऐसे संयासी या ऋषि मुनि जिन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई हो। ऋषि अगस्त्य उन 18 सिद्धर या ज्ञानियों में शामिल हैं जिन्हें औषधी, योग और मेडिटेशन में श्रेष्ठता हासिल है। 

ऋषि अगस्त्य को सिद्ध चिकित्सा के हिप्पोक्रेट के तौर पर भी जाना जाता है। हिप्पोक्रेट्स असल में ग्रीस के एक चिकित्सक या वैद्य थे जिन्हें आधुनिक चिकित्सा के पिता के तौर पर जाना जाता है। आधुनिक समय में देशभर में आयुर्वेद का तो अभ्यास और इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में सिद्ध पद्धति का अभ्यास सिर्फ दक्षिण भारत के राज्यों में और उसमें भी खासकर सिर्फ तमिलनाडु और केरल में ही होता है।

सिद्ध चिकित्सा का अभ्यास मौजूदा समय में आयुर्वेद, योग और नैचरोपैथी, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी यानी आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आता है। साल 2018 में आयुष मंत्रालय ने 4 जनवरी को जिसे ऋषि अगस्त्य का जन्मदिन भी माना जाता है उस दिन को सिद्ध दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। साल 2019 से आयुष मंत्रालय देशभर के कई बड़े अस्पतालों में सिद्ध क्लिनिक भी खोल रहा है जैसे नई दिल्ली के सफरदंग अस्पताल में।

  1. सिद्ध का इतिहास - Siddha ka itihas
  2. सिद्ध के सिद्धांत - Siddha ke principles
  3. सिद्ध औषधी के फायदे - Siddha medicine ke fayde
  4. सिद्ध के मौलिक तत्व - Siddha ke basics
  5. सिद्ध की दवाएं - Siddha ki dawa
  6. सिद्ध औषधी में इलाज - Siddha me ilaj
  7. दुष्प्रभाव और विवाद - Siddha ke side effects

सिद्ध का इतिहास - Siddha ka itihas

पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव ने खुद ऋषि अगस्त्य को सिद्ध का ज्ञान दिया था। ऋषि अगस्त्य जिन्हें तमिल भाषा का जनक भी माना जाता है उन्होंने सिद्ध चिकित्सा, औषधी और सर्जरी से जुड़ी कई किताबें लिखीं जिनका इस्तेमाल आज भी कई सिद्ध चिकित्सक करते हैं। पुरातन समय में विद्वानों को सिद्ध औषधी से जुड़ा यह ज्ञान सिद्ध औषधी के बारे में प्राचीन समय में लिखे गए मूलग्रंथों, योग, उपवास और ध्यान के जरिए प्राप्त होता था। आज के समय में सिद्ध को, औषधी के कई दूसरे प्राचीन और पारंपरिक पद्धतियों की ही तरह सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाया जाता है खासकर दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु और केरल में। 

सिद्ध के सिद्धांत - Siddha ke principles

औषधी की सिद्ध पद्धति में एक व्यक्ति को ब्रम्हांड के सूक्ष्म रूप के तौर पर देखा जाता है जो कि 5 प्राकृतिक तत्वों- धरती, अग्नि, वायु, जल और आकाश और 3 भाव या रस- वात (गतिविधि), पित्त (पाचन या मेटाबॉलिज्म) और कफ से मिलकर बना है। हम जिस भोजन का सेवन करते हैं वह इंसान के शरीर के लिए ईंधन का काम करता है और शरीर के तीनों रसों द्वारा परिष्कृत किया जाता है और जब शरीर के अंदर यह संतुलन नहीं बन पाता तब व्यक्ति बीमार हो जाता है। 

सिद्ध चिकित्सा का मूलभूत सिद्धांत बहुत हद तक आयुर्वेद से मिलता जुलता है लेकिन जब आप विस्तार से इसका अध्ययन करने लगते हैं तो आपको दोनों के बीच अंतर साफ दिखने लगता है क्योंकि औषधी की इस शाखा सिद्ध की परंपराएं और विशिष्टता तमिल या द्रविड़ सभ्यता और दर्शनशास्त्र से जुड़ी है। आयुर्वेद से खुद को अलग करने का सिद्ध चिकित्सा का सबसे बड़ा तरीका ये है कि सिद्ध औषधी को बनाने में धातु और खनिज पदार्थों का भी इस्तेमाल किया जाता है। सिद्ध औषधी में सल्फर, माइका या अभ्रक, मर्क्युरी या पारा और कई दूसरे धातु और खनिजों से बनी दवाइयों के मेल को शामिल किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह एक ऐसी पद्धति है जिसका इस्तेमाल छठी शताब्दी एडी से होता आ रहा है। 

सिद्ध सिस्टम की मूल अवधारणा एक ऐसे सिस्टम के बारे में है जिसमें शरीर, दिमाग और आत्मा तीनों पर बराबर जोर दिया जाता है। जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसके शरीर में इस संतुलन को दोबारा से सही करने की कोशिश की जाती है। सिद्ध औषधी के अभ्यास में ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें करना चाहिए और नहीं करना चाहिए शामिल है जिन्हें पथियम और अपथियम कहते हैं। 

सिद्ध चिकित्सा की कई प्रसिद्ध किताबें और मूलग्रंथ रसशास्त्र या ऐल्कमी इस कैटिगरी के तहत आते हैं। करीब 200 किताबें ऐसी हैं जिन्हें ऐल्कमी पर फोकस करके लिखा गया है और ये सभी किताबें तमिल भाषा में हैं। ऋषि अगस्त्य द्वारा लिखे गए मूलग्रंथ जो अब भी बचे हुए हैं वे हैं- पन्नीर कंदम, पक्केवेत्तुसूत्रम, गुरुसेनिर, काराक्कू और मुप्पूवइप्पू। 

ऐसी मान्यता है कि सिद्ध औषधी के कई चिकित्सकों को ऐल्कमी या रसशास्त्र का जो ज्ञान प्राप्त हुआ है वह चीन से मिला है या फिर औषधी और रसशास्त्र से जुड़े चीनी विशेषज्ञों से मिला है। सिद्ध के मुताबिक, इंसान के शरीर के 7 अलग-अलग तत्व अलग-अलग मिश्रण और परिवर्तन से बनते हैं वे उस व्यक्ति के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कार्यपद्धतियों का निर्माण करते हैं:

  • सरम : प्लाज्मा जो इंसान के शरीर की उत्पत्ति, विकास और पोषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है
  • चेनीर : खून जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच कर शरीर को पोषण देता है, शुद्ध करता है और फिर से जवान बनाने में मदद करता है
  • ऊन : मांसपेशियां जो इंसान के शरीर को आकार देने का काम करते हैं
  • कोलजुप्पू : फैटी टीशू जो हड्डियों के जोड़ को चिकना रखते हैं और उन्हें टूटने-फूटने से बचाते हैं
  • एन्बू : हड्डियां जो इंसान के शरीर को सरंचना और मुद्रा देने का काम करती हैं ताकि गतिविधियां करना आसान हो
  • मूलई : नसें जो शरीर को मजबूती देने का काम करती हैं
  • सुकिला : सीमन जो प्रजनन के लिए जिम्मेदार होता है

सिद्ध चिकित्सक मूल रूप से किसी अंग की दुष्प्रक्रिया का इलाज करते हैं जिसकी वजह से व्यक्ति को कोई बीमारी होती है। सिद्ध औषधी के मुताबिक, स्वस्थ अन्तर्आत्मा का रास्ता स्वस्थ शरीर से होकर गुजरता है।

सिद्ध औषधी के फायदे - Siddha medicine ke fayde

सिद्ध, औषधी का एक प्राचीन अभ्यास है। औषधी के आधुनिक रूपों की तरह सिद्ध भले ही बहुत ज्यादा प्रसिद्ध न हो या फिर दुनियाभर में इसे स्वीकार न किया गया हो या इसका अभ्यास न किया जाता हो या फिर सिद्ध, औषधी के सर्वव्यापी अभ्यास के तौर पर स्थापित न हो। लेकिन सिद्ध औषधी का मूल सिद्धांत भी इसी बात पर फोकस करता है कि- इंसान के शरीर को स्वस्थ और निरोग बनाना है।

औषधी की सिद्ध शाखा, आपातकालीन मामलों के अधिकार से बाहर की बीमारियों का इलाज करने के लिए भी जानी जाती है। त्वचा से जुड़ी समस्याएं जैसे- सोरायसिस, यौन संचारित रोग, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी जठरांत्र से जुड़े इंफेक्शन, लिवर से जुड़ी समस्याएं, प्रसव के बाद की समस्याएं जैसे- एनीमिया, डायरिया या फिर आर्थराइटिस और एलर्जी- ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनका सिद्ध औषधी के जरिए इलाज किया जाता है।

सिद्ध के मौलिक तत्व - Siddha ke basics

सिद्ध चिकित्सा प्रणाली के तहत किसी बीमारी को डायग्नोज करने के लिए सिद्ध के चिकित्सक मरीज की नब्ज, त्वचा, जीभ, चेहरे का रंग-रूप, बोलने का तरीका, आंखें, यूरिन और स्टूल आदि की जांच करते हैं। इन 8 तरीके के परीक्षणों के जरिए बीमारी को डायग्नोज किया जाता है और इसमें भी नब्ज की जांच को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है।

भारतीय औषधी के दूसरे पारंपरिक तरीकों से भिन्न सिद्ध औषधी में पर्याप्त मात्रा में धातु और खनिजों के इस्तेमाल का समर्थन किया जाता है जो इसकी उन्नति का सूचक है बाकी प्राचीन औषधियों के तरीकों की तुलना में। दवा बनाने में धातु और खनिजों का इस्तेमाल करने का एक कारण ये भी है कि ऐसी कई निश्चित जड़ी बूटियां हैं जो सालों भर उपलब्ध नहीं होती हैं। सिद्ध दवाइयों को 3 कैटिगरी में बांटा जाता है:

  • थावरम : जड़ी बूटियों (हर्बल) के उत्पादों से बनी
  • थाथू : अजैविक पदार्थों से बनी
  • जंगामम : जानवरों के उत्पादों से बनी

सिद्ध औषधी में इस्तेमाल होने वाली जड़ी बूटियां सिर्फ दक्षिण भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं। कई ऐसी जड़ी बूटियां हैं जिन्हें उत्तर भारत के हिमालय के क्षेत्र से भी लिया जाता है। शक्तिशाली पेनकिलर या दर्दनिवारक दवाइयों में कैनबिस यानी भांग का इस्तेमाल किया जाता है तो वहीं मानसिक सेहत से जुड़ी समस्याओं की दवा में प्राथमिक रूप से जानवरों के उत्पाद का इस्तेमाल होता है। 

सिद्ध औषधियों को 5 अलग-अलग तत्वों में तोड़ा जा सकता है:

  • सुवई (स्वाद)
  • गुना (प्रकृति या स्वभाव)
  • वीर्य (क्षमता)
  • पिरिवु (श्रेणी या दर्जा)
  • महिमई (कार्रवाई)

सिद्ध औषधियों का इस्तेमाल दो तरह से होता है- इसमें से दवा की एक श्रेणी को ओरली यानी मौखिक (इस श्रेणी को 32 कैटिगरी में तोड़ा जाता है) रूप से दिया जाता है, जबकी दवा की दूसरी श्रेणी में किसी तरह की चोट, स्किन इंफेक्शन, नाक, आंख या सुनने की समस्याओं के इलाज में दवा को किसी स्थान विशेष पर बाहर से लगाया जाता है।

सिद्ध की दवाएं - Siddha ki dawa

जैसा की पहले ही बताया गया है सिद्ध पद्धति की दवाइयों के तहत दवाइयों की अलग-अलग कैटिगरी को विकसित किया जाता है जिसमें धातु, खनिज और अलग-अलग उत्पादों के अलग-अलग कॉम्बिनेशन शामिल हैं:

  • उप्पू : औषधी के इस सिस्टम में अजैविक तत्वों की 25 वरायटी पायी जाती है जो पानी में घुलनशील है और अलग-अलग क्षार और लवण से तैयार किया गया है।
  • सिद्ध औषधी में सल्फर और मर्क्युरी यानी पारे को भी अहम स्थान दिया गया है।
  • 64 वरायटी की खनिज बेस्ड दवाइयां जो पानी में घुलती नहीं है लेकिन जब उन्हें गर्म किया जाता है या आग में रखा जाता है तो उसमें से भाप निकलता है। इनमें से आधी दवाइयां प्राकृतिक रूप से बनायी जाती हैं जबकी बाकी आधी दवाइयां आर्टिफिशल तरीके से।
  • सोना, चांदी, तांबा, सीसा और लोहा- ये कुछ प्रमुख धातु हैं जो कई दवाइयों के प्रमुख घटक के तौर पर इस्तेमाल होते हैं और उनका वर्गीकरण उनके तत्वों के आधार पर किया जाता है, गर्म करने पर जैसे वे पिघलते हैं या फिर ठंडा करने पर ठोस बन जाते हैं।
  • इसके अलावा 7 और दवाइयां हैं जिन्हें गर्म करने की प्रक्रिया के तहत तैयार किया जाता है, गर्म करने पर इनमें से भाप निकलता है लेकिन वे पानी में घुलती नहीं हैं।
  • पंचसूथ : मर्क्युरी या पारे को 5 अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया जाता है वे हैं- रसम (मर्क्युरी), लिंगम (मर्क्युरी का रेड सल्फाइड), वेरम (मर्क्युरी परक्लोराइड), पूरम (मर्क्युरी सबक्लोराइड) और रस-चिंदुरम (मर्क्युरी का रेड ऑक्साइड)

इलाज के लिए अलग-अलग दवाइयों के साथ ही योग और प्राणायाम भी बेहद जरूरी है ताकि व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ बनाकर उसे दीर्घकालीन जीवन दिया जा सके।

सिद्ध औषधी में इलाज - Siddha me ilaj

सिद्ध औषधी की शाखा के तहत किए जाने वाले इलाज को 3 अलग-अलग कैटिगरी में बांटा जा सकता है:

  • देव मारुथुवम या दैवीय पद्धति जिसमें धातु और खनिज जैसे- सल्फर या मर्क्युरी से प्राप्त की गई दवा के इस्तेमाल पर फोकस किया जाता है
  • मानिदा मारुथुवम या तर्कसंगत पद्धति जिसमें जड़ी बूटियों से तैयार की गई दवाइयों का इस्तेमाल होता है
  • असुर मारुथुवम या सर्जिकल पद्धति जिसमें चीरा लगाया जाता है, गर्मी दी जाती है, घाव में जोंक लगाया जाता है या रक्तस्त्राव भी होता है

दुष्प्रभाव और विवाद - Siddha ke side effects

सिद्ध औषधी और इससे जुड़ी थेरेपीज के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। साल 2018 में ऐनल्स ऑफ इंडियन अकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक स्टडी की मानें तो ऐसे 32 मरीजों की जांच की गई जिन्हें मर्क्युरी युक्त सिद्ध औषधी दी गई थी और उनमें न्यूरोमायोटोनिया के लक्षण की नकल दिख रही थी। स्टडी में शामिल करीब दो तिहाई मरीज जिन्हें साल 2012 से 2016 के बीच यह दवा दी गई थी उन्हें मर्क्युरी टॉक्सिटी यानी पारे की विषाक्तता की वजह से अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। (न्यूरोमायोटोनिया, नसों में हद से ज्यादा उत्तेजना की एक ऐसी स्थिति है जिसमें मांसपेशियां स्वाभाविक रूप से गतिविधियां करने लगती हैं)

साल 1953 में सिद्ध औषधी को ग्रामिण इलाकों में वैकल्पिक दवा के प्रकार के तौर पर बैन कर दिया गया था। साल 2014 से लगातार भारत का सर्वोच्च न्यायालय और इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) सिद्ध को नीमहकीमी या मिथ्या चिकित्सा के रूप में खारिज करता रहा है।

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